Saturday, February 13, 2010



बादलों ने ना समझा बताना मुनासीब,
बरसे बग़ैर ही चल दिए |
ज़मीन उनके हाल-ए-दिल से नावाकीफ,
रीश्ते को दफ़न ही कर दिए |

अब कब्र पर सिर टिक के रोता है,
ज़िंदा को दफ़ना के ईमान,
और आसमान पे टिकाए बैठी है,
बंजर उम्मीद, दो अखियाँ |

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एक दफ़ा इशारा तो कर देते,
हम एक और साल इंतेज़ार कर लेते |


--hp.

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